दत्ता गुरु

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर जाने कौन है दत्तात्रिदेव और दत्ता गुरु

मान्यता के अनुसार दत्ता गुरु ने २४ गुरु माँ से शिक्षा दीक्षा प्राप्त करी थी मान्यता अनुसार दत्तात्रि, शिव, विष्णु तथा ब्रह्मा, के अवतार है जिनके तीन सर और छे भुजाये है दत्ता गुरु को गुरु एवम ईश्वर दोनों की उपाधि प्राप्त है शास्त्रों के अनुसार , बचपन से ही दत्ता गुरु को प्रकृती से बहुत लगाव था और इसी लगाव के कारन उन्होंने प्रकर्ति की २४ गुरु से शिक्षा ली। इसी प्रकार जो भी व्यक्ति दत्ता गुरु की सच्चे मन से भक्ति आराधना करता है दत्ता गुरु उसकी इक्छा को पूर्ण करते है

हिन्दू धर्म मे भगवान श्री दत्तागुरु को गुरु मानकर कर उनकी पादुका का पूजन किया जाता है आईये जानते दत्ता त्रि गुरु की कथा एवम पौराणिक मान्यता

गुरुपूर्णिमा का महत्व पढ़े कब मनाई जाती है

दत्ता गुरु के जन्म की पौराणिक कहानी

एक बार नारद मुनि , त्रि देव भगवन विष्णु महेश एवम ब्रम्हा देव की की अर्धांग्नी लक्ष्मी , पार्वती और माँ सरश्वती के पास पहुंचे और उन्हें पतिब्रता माँ अनुसुइया के तप के बारे मे बताया , जिससे ईर्ष्या के कारन तीनो देवी ने त्रि देव को माँ अनुसुइया की परीक्षा लेने के ले पृथ्वी लोक पर भेजा, माँ अनुसुइया महर्षि अत्रि की पत्नी थी

अतः त्रि देव भेष बदल कर, माँ अनुसुइया के पास पहुंचे , और उनसे भिक्षा मांगी , माँ अनुसुइया भिक्षा ले कर आ गई परन्तु त्रि देव उनकी पतिब्रत्तव की परीक्षा लेने के ले त्रि देव ने कहा की हे देवी जब यह भिक्षा आप हमें नग्न रूप मे देंगी तब हम इसी स्वीकार करेंगे, ये सुनकर माँ अनुसुइया सोच मे पर गई,

फिर माँ अनुसुइया ने अपने तप से अभिमंत्रित जल को त्रिदेव के ऊपर छिड़क दिया , जिससे त्रि देव बालक रूप मे आ गये और माँ अनुसुइया ने उन्हें भिक्षा मे स्तन पान कराया , ऋषि अत्रि पहले ही अपनी दिव्या दृष्टि से ये सब देख लिया था , अतः वो जानते थे की ये सन्यासी भगवान ब्रह्मा विष्णु और महेश है

अतः ऋषि अत्रि मे अपने शक्ति से ट्रिनो बालक को को एक ही शिशु मे बदल दिया। इसके उपरान्त जब ये बात त्रि देवी को पता चली तव वे माता अनुसुइया के पास आ कर प्रार्थना की , उनके पति को उनके रूप मे सौप दे , अतः ऋषि अत्रि ने उनके आग्रह को स्वीकार किया , तथा बालक बापस ब्रह्मा विष्णु महेश के रूप मे वापस आ गये। तथा उनसे बरदान मांगने को कहा , अतः माँ अनुसुइया ने वरदान मे त्रि देव जैसा बालक माँगा।

जिसके उपरांत त्रिदेव ने खुश होकर वरदान मे दत्तात्रि बालक दिया जो ब्रम्हा विष्णु और महेश का रूप का अवतार था मुख्यता दत्तात्रि विष्णु का अवतार माने जाते है दत्ता गुरु का शरीर एक था पर उनके तीन सर और छे भुजाये थी , और भगवान दत्तात्रि शिव रूप जैसे भेष मे रहते थे इनके भाई चंद्र देव तथा दूसरे भाई ऋषि दुर्वासा थे।

दत्तात्रिय जयंती कब मनाते है?

महारष्ट्रा मे दत्तात्रिय जयंती बहुत धूम धाम से मनाई जाती है , श्री दत्ता गुरु , ऋषि अत्रि तथा माता अनुसूया के पुत्र है इस प्रकार भगवान दत्ता गुरु जयंती मार्ग शीर्ष माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है जोकि दिसंबर या जनवरी मे आती है

श्री दत्ता गुरु का रूप

पौराणिक चित्र के अनुसार , दत्ता गुरु शिव रूप जैसे दिखते है , त्रिदेव मय रूप है इनका ,जो की विष्णु का अवतार माने जाते है चित्र मे इनकी पीछे एक गाये और चार कुत्ते दिखाई देते है औदुंबर वृक्ष के समीप इनका निवास बताया गया है

श्री गुरु देव की चरण पादुका

श्री सद्गुरु और भगवान दत्तात्रि की चरण पादुका , काशी मे मणिकर्णिका घाट की दत्त पादुका तथा मुख्य पादुका स्थान कर्नाटक के बेलगाम में स्थित है जो हिन्दू धर्म मे बहुत पूजनीय है

गुरु देव का पाठ एवम जप

आप गुरु देव के पाठ के लिए , दत्ता गुरु अवतार-चरित्र‘ और ‘गुरुचरित्र‘, का पाठ कर सकते है , जो की वेद तुल्य है

भगवान दत्ता गुरु के चोवीस गुरु –

भगवान दत्ता त्रिय ने इन प्राकृतिक गुरुओ को अपना गुरु बनाया और इन २४ गुरु से दीक्षा प्राप्त की। पृथ्वी, जल , वायु , अग्नि, समुद्र , आकाश, सूर्य , चन्द्रमा , अजगर , कपोत , पतंगा , मछली , हिरन , हाथी, मदुमकखी , शहद निकलने वाला , कुरर पक्षी, सर्प , वालक , कुमारी कन्या ,पिंगला वैश्या, बाण बनाने वाला, मकड़ी, भृंगी कीट

जगद्गुरु श्री आदि शंकराचार्य द्वारा भगवान दत्तात्रेय का बर्णन

“आदौ ब्रह्मा मध्ये विष्णुरन्ते देवः सदाशिवः

मूर्तित्रयस्वरूपाय दत्तात्रेयाय नमोस्तु ते।

ब्रह्मज्ञानमयी मुद्रा वस्त्रे चाकाशभूतले

प्रज्ञानघनबोधाय दत्तात्रेयाय नमोस्तु ते।।”

अर्थ -“जो आदि में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा अन्त में सदाशिव है, उन भगवान दत्तात्रेय को बारम्बार नमस्कार है। ब्रह्मज्ञान जिनकी मुद्रा है, आकाश और भूतल जिनके वस्त्र है तथा जो साकार प्रज्ञानघन स्वरूप है, उन भगवान दत्तात्रेय को बारम्बार नमस्कार है।”


अतः दत्ता गुरु या दत्तात्रि , भगवान और गुरु दोनों का रूप है , जो भी इनकी सच्चे मन से आराधना करता है , ईश्वर और गुरु के रूप मे आराधना करता है उसकी सभी मनोकामना पूर्ण होती है

इस पोस्ट के द्वारा मेने गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर आपको दत्ता गुरु की पौराणिक कहानी , तथा हिन्दू धर्म मे उनके इश्वरिये एवम गुरु रूप के महत्व को बताने का प्रयास किया है , अगर आपके कोई गुरु नहीं , तो आप दत्ता गुरु को अपना गुरु मान कर उनका पूजन कर सकते है जो की ईश्वर त्रि देव का भी रूप है

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